पर्यावरण संरक्षण और भारतीय सिनेमा: पर्दे पर प्रकृति की पुकार

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05 जून 2026 | विशेष लेख

यह लेख डॉ. जोखन शर्मा द्वारा लिखा गया है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।

जब भी हम सिनेमा की बात करते हैं, हमारे मन में मनोरंजन, गीत-संगीत, रोमांच और भावनाओं से भरी कहानियाँ उभर आती हैं। लेकिन सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह समाज का दर्पण भी है और समय-समय पर समाज को दिशा देने का कार्य भी करता है। आज जब पर्यावरण संकट पूरी दुनिया के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है, तब भारतीय सिनेमा की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पिछले कुछ दशकों में हमने विकास की दौड़ में बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन इसके साथ ही हमने अपने जंगल, नदियाँ, पहाड़ और जैव विविधता को भी नुकसान पहुँचाया है। बढ़ता प्रदूषण, घटते वन, जल संकट और जलवायु परिवर्तन अब केवल समाचारों की सुर्खियाँ नहीं रह गए हैं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे समय में सिनेमा जैसे प्रभावशाली माध्यम की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह समाज को जागरूक करे और पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील बनाए।
भारतीय सिनेमा में प्रकृति हमेशा से एक महत्वपूर्ण तत्व रही है। कभी कश्मीर की वादियाँ, कभी हिमालय की चोटियाँ, कभी राजस्थान का रेगिस्तान और कभी केरल की हरियाली फिल्मों की खूबसूरती को बढ़ाती रही हैं। लेकिन अब सिनेमा केवल प्रकृति की सुंदरता दिखाने तक सीमित नहीं है। कई फिल्में पर्यावरणीय मुद्दों को अपनी कहानी का केंद्र बना रही हैं। इन फिल्मों के माध्यम से दर्शकों को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि प्रकृति केवल पर्यटन का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।
जल संकट पर आधारित कहानियाँ हों या जंगलों के संरक्षण की बात, भारतीय सिनेमा ने कई बार इन विषयों को गंभीरता से उठाया है। फिल्मों और वृत्तचित्रों ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि यदि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इसी तरह जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यही कारण है कि आज पर्यावरण विषयक फिल्में केवल पुरस्कार जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का सशक्त उपकरण बनती जा रही हैं।
वन्यजीव संरक्षण भी ऐसा ही एक विषय है, जिसे भारतीय सिनेमा ने समय-समय पर सामने लाने का प्रयास किया है। बाघ, हाथी, गिद्ध और अन्य वन्य जीव केवल जीव-जंतु नहीं हैं, बल्कि हमारे पारिस्थितिक तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं। जब फिल्मों में इनके संरक्षण की बात होती है, तो दर्शकों के मन में भी इनके प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है।
हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा भी फिल्मों और डिजिटल कंटेंट में दिखाई देने लगा है। अनियमित बारिश, सूखा, बाढ़ और बढ़ता तापमान अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित नहीं हैं। इनके प्रभाव आम लोगों के जीवन में साफ दिखाई दे रहे हैं। सिनेमा इन वास्तविकताओं को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत करके लोगों को सोचने और अपनी जिम्मेदारी समझने के लिए प्रेरित कर सकता है।
हालाँकि केवल पर्यावरण संरक्षण पर फिल्में बनाना ही पर्याप्त नहीं है। फिल्म उद्योग को स्वयं भी पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार होना होगा। बड़े फिल्म सेट, ऊर्जा की खपत, प्लास्टिक का उपयोग और शूटिंग के दौरान उत्पन्न होने वाला कचरा भी पर्यावरण को प्रभावित करता है। इसलिए आज दुनिया भर में “ग्रीन फिल्ममेकिंग” की अवधारणा पर जोर दिया जा रहा है, जिसमें फिल्म निर्माण को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने का प्रयास किया जाता है।
दरअसल, सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत उसकी पहुँच और प्रभाव है। एक अच्छी फिल्म लाखों लोगों की सोच बदल सकती है। जिस तरह फिल्मों ने सामाजिक कुरीतियों, महिला सशक्तिकरण और शिक्षा जैसे विषयों पर जनमत तैयार किया है, उसी तरह पर्यावरण संरक्षण के लिए भी सकारात्मक माहौल बना सकती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि फिल्मकार केवल प्रकृति को सुंदर पृष्ठभूमि के रूप में न दिखाएँ, बल्कि पर्यावरणीय चुनौतियों और उनके समाधान को भी अपनी कहानियों का हिस्सा बनाएँ। जब दर्शक किसी कहानी से भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं, तो उसका संदेश लंबे समय तक उनके मन में बना रहता है।
अंततः, पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या पर्यावरणविदों का काम नहीं है। यह हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। भारतीय सिनेमा इस जिम्मेदारी को निभाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। यदि सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी देता रहे, तो यह समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का एक प्रभावशाली माध्यम बन सकता है।
क्योंकि अंत में बात केवल पेड़ों, नदियों या जंगलों की नहीं है, बल्कि उस भविष्य की है जिसमें हम और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ सांस लेंगी। और शायद यही वह कहानी है, जिसे भारतीय सिनेमा को बार-बार कहना चाहिए।
जब भारतीय सिनेमा ने पर्यावरण की आवाज़ को पर्दे पर उतारा
भारतीय सिनेमा में पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर बनी फिल्मों की संख्या भले ही बहुत अधिक न हो, लेकिन जिन फिल्मों ने इस विषय को छुआ है, उन्होंने दर्शकों के मन पर गहरी छाप छोड़ी है। भारतीय सिनेमा में जब जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के मुद्दों की चर्चा होगी, तब मदर इंडिया से लेकर कांतारा, कड़वी हवा, जोरम, शेरनी और अनेक ऐसी फिल्में हमारे सामने सजीव हो उठेंगी। ये केवल मनोरंजन की कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और मानव जीवन के गहरे संबंधों को उजागर करने वाले सशक्त दस्तावेज हैं। अपनी कथाओं, पात्रों और संवेदनशील प्रस्तुतियों के माध्यम से ये फिल्में सत्ता, समाज और आम जनता को झकझोरते हुए यह याद दिलाती हैं कि विकास तभी सार्थक है, जब वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का संदेश देती ये सिनेमाई कृतियाँ हमें पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराती हैं और एक अधिक संवेदनशील तथा टिकाऊ भविष्य की ओर सोचने के लिए प्रेरित करती हैं।
इन फिल्मों ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि प्रकृति, जल, जंगल, जमीन और वन्यजीवों से जुड़े गंभीर सवालों को समाज के सामने रखा।
‘पान्हा’ (Panha) ऐसी ही एक संवेदनशील फिल्म है, जिसका निर्माण अभिनेत्री और पर्यावरण कार्यकर्ता Dia Mirza ने किया। महाराष्ट्र के ग्रामीण परिवेश में आधारित यह कहानी सात वर्षीय विठ्ठू की है, जो बुलेट ट्रेन परियोजना के कारण अपने परिवार की आम की बागवानी और जमीन खोने की पीड़ा से गुजरता है। यह फिल्म विकास और विस्थापन के बीच के संघर्ष को बेहद मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है।
वर्ष 2013 में आई “जल (Jal)” भारत के शुष्क कच्छ क्षेत्र में पानी की समस्या पर आधारित एक महत्वपूर्ण फिल्म है। फिल्म का नायक बक्का सूखे से जूझ रहे लोगों के लिए पानी खोजने का प्रयास करता है, लेकिन उसे सत्ता और स्वार्थ की राजनीति का सामना करना पड़ता है। यह फिल्म जल संकट और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की राजनीति को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है।
जलवायु परिवर्तन के मानवीय प्रभावों को समझने के लिए “कडवी हवा (Kadvi Hawa)” एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह फिल्म एक किसान और बैंक रिकवरी एजेंट की कहानी के माध्यम से दिखाती है कि बदलता मौसम और पर्यावरणीय असंतुलन किस प्रकार आम लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है। यह फिल्म जलवायु संकट को आंकड़ों से नहीं, बल्कि इंसानी दर्द के माध्यम से समझाती है।
मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को “शेरनी (Sherni)” में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। विद्या बालन अभिनीत यह फिल्म बताती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल जंगलों की नहीं, बल्कि प्रशासन, राजनीति और समाज की भी चुनौती है। फिल्म वनों की कटाई और बाघों के प्राकृतिक आवास पर बढ़ते दबाव की ओर ध्यान आकर्षित करती है।
मानव-पशु संघर्ष विषय को व्यंग्यात्मक शैली में ‘Sherdil: The Pilibhit Saga’ प्रस्तुत करती है। यह फिल्म जंगल के आसपास रहने वाले ग्रामीण समुदायों, गरीबी और मानव-पशु संघर्ष की जटिलताओं को उजागर करती है।
हाथियों के संरक्षण और जंगलों के महत्व पर आधारित दक्षिण भारतीय भाषा में बनी फिल्म ‘कादन (Kaadan)’ भी पर्यावरणीय सिनेमा की एक उल्लेखनीय कड़ी है। अभिनेता Rana Daggubati द्वारा निभाया गया पात्र जंगल और हाथियों की रक्षा के लिए संघर्ष करता है। फिल्म यह संदेश देती है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि असंख्य जीवों का घर हैं और मानव विकास की योजनाओं में उनके अस्तित्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाल के वर्षों में आई जोरम (Joram) ने विकास और विस्थापन के प्रश्न को बेहद मार्मिक ढंग से उठाया। यह फिल्म आदिवासी समुदायों, उनकी जमीन, जंगल और पहचान पर बढ़ते खतरे को सामने लाती है। ‘जोरम’ हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास का वास्तविक अर्थ क्या है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है।
इन फिल्मों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये पर्यावरण को केवल वैज्ञानिक या तकनीकी विषय के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उसे मनुष्य के जीवन, संस्कृति, आजीविका और अस्तित्व से जोड़कर प्रस्तुत करती हैं। यही कारण है कि ये फिल्में दर्शकों को केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि उन्हें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील बनने के लिए प्रेरित भी करती
कांतारा (2022) भारतीय सिनेमा की एक महत्वपूर्ण फिल्म है, जो जंगल, स्थानीय संस्कृति और प्रकृति के साथ मानव के सह-अस्तित्व की कहानी प्रस्तुत करती है। Rishab Shetty द्वारा निर्देशित इस फिल्म में वन संसाधनों, भूमि अधिकारों और आदिवासी समुदायों के प्रकृति से गहरे संबंध को दर्शाया गया है। फिल्म यह संदेश देती है कि जंगल केवल संसाधनों का स्रोत नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की संस्कृति, पहचान और जीवन का आधार हैं। पर्यावरण संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान के महत्व को उजागर करने के कारण कांतारा को भारतीय पर्यावरणीय सिनेमा की एक प्रभावशाली कृति माना जाता है।
जन-जागरूकता में सिनेमा की भूमिका
सिनेमा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी व्यापक पहुँच और भावनात्मक प्रभाव है। जब किसी पर्यावरणीय समस्या को कहानी, पात्रों और दृश्य माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है, तो उसका प्रभाव दर्शकों के मन पर गहराई से पड़ता है। सिनेमा लोगों को केवल जानकारी ही नहीं देता, बल्कि उन्हें प्रेरित भी करता है कि वे अपने दैनिक जीवन में पर्यावरण संरक्षण के लिए छोटे-छोटे कदम उठाएँ।
आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ फिल्मों और वृत्तचित्रों का प्रभाव और भी बढ़ गया है। पर्यावरणीय विषयों पर आधारित सामग्री अब अधिक लोगों तक पहुँच रही है, जिससे समाज में जागरूकता का स्तर बढ़ रहा है।
निष्कर्ष
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या पर्यावरणविदों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। भारतीय सिनेमा इस दिशा में जागरूकता फैलाने और सकारात्मक परिवर्तन लाने का एक प्रभावशाली माध्यम है। यदि फिल्म उद्योग पर्यावरणीय विषयों को और अधिक गंभीरता से प्रस्तुत करे तथा स्वयं भी पर्यावरण-अनुकूल प्रक्रियाओं को अपनाए, तो वह सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के अभियान को नई गति प्रदान कर सकता है।
प्रकृति और मानव का संबंध अत्यंत गहरा है। इस संबंध को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि हम पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनें और सिनेमा जैसे प्रभावशाली माध्यमों का उपयोग जन-जागरूकता और सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के लिए करें। पर्यावरण संरक्षण और भारतीय सिनेमा का यह संबंध भविष्य में एक हरित, सुरक्षित और टिकाऊ समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

✍️ लेखक परिचय

डॉ. जोखन शर्मा
मानववैज्ञानिक (Anthropologist), सामाजिक शोधकर्ता एवं पर्यावरण चिंतक

डॉ. जोखन शर्मा जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरणीय अध्ययन, जनजातीय एवं ग्रामीण समुदायों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन तथा सतत विकास से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में वे माटी जैव विविधता संरक्षण एवं सामाजिक शोध संगठन, देहरादून से संबद्ध हैं। उनके शोध एवं लेखन का केंद्र पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय ज्ञान परंपराएं, ग्रामीण विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण है। वे विभिन्न सामाजिक एवं पर्यावरणीय विषयों पर नियमित लेखन करते हैं।

संबद्धता: माटी जैव विविधता संरक्षण एवं सामाजिक शोध संगठन, देहरादून
विशेष रुचि: पर्यावरण संरक्षण | जैव विविधता | जनजातीय अध्ययन | सतत विकास

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