फिजाओं में फागुन के रंग दिखने लगे हैं। होली का जिक्र हो तो भगवान कृष्ण की नगरी का न हो तो अधूरा है। मथुरा में वृंदावन से लेकर बरसाना तक होली की तैयारियां जोरों पर हैं। बरसाना की लट्ठमार होली के लिए श्रीजी मंदिर के सेवायत पुजारी 10 कुंतल टेसू के फूलों से रंग तैयार कर रहे है। जिसको आगामी 11 मार्च को श्रीजी मंदिर छतरी से नंदगांव के हुरियारों व श्रद्धालुओं पर डाला जाएगा।
10 दिन में तैयार होता है रंग
दरअसल लठ्ठमार होली की परंपरा बड़ी ही निराली है, जिसमें हर चीज परंपरा के अनुसार होती है। बात हुरियारिनों की हो चाहे हुरियारो की दोनों ही द्वापरकाल परंपरा को संजोह हुए है। लठ्ठमार होली के दौरान होली खेलने में रंग और अबीर गुलाल की बरसात होती है, जिससे रंगीली गली से लेकर पूरा बरसाना कस्बा रंगमय हो जाता है। इस बार बरसाना लाडली जी मंदिर के सेवायतों द्वारा विशेष प्रकार का रंग तैयार कराया जा रहा है। जिसके लिये टेसू के कुंटलो फूलों का प्रयोग किया जाता है। इसको तैयार करने में 10 दिन लग जाते हैं।
10 क्विंटल टेसू के फूल से तैयार हो रहे हैं रंग
श्री जी मंदिर सेवायत ने बताया कि रंग को बनाने के लिए दिल्ली से टेसू के 10 क्विंटल फूल मंगाए गए। इन फूलों को पानी में भिगो कर रखा जाता है। फूलों का रस निकाल कर छान लिया जाता है बाद में इस रंग को चूने में मिलाकर ड्रमों में भर दिया जाता है। टेसू के फूल से बने इस रंग को लाडली जी मंदिर में ऊपर की मंजिलों में पर रख दिया जाता है। इस रंग को आने वाले श्रद्धालुओं एवं नंदगांव के हुरियारों पर डाला जाता है।
बरसाना लठमार होली का ऐसे बनता है रंग
टेसू ईको फ्रेंडली रंग सबसे पहले टेसू के कुंतलो फूलों को पानी के साथ बड़े बड़े ड्रमों में पानी के साथ भिगोया जाता है। उसके बाद फूलों का रस निकाल जाता है। निकले रस में चुने को मिलाकर वापस ड्रमों में भर दिया जाता है। इस प्रकार तैयार किया जाता है टेसू ईको फ्रेंडली रंग फिर खेली जाती है विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली।
टेसू के ही फूल क्यों होते हैं लट्ठमार होली में
श्रीजी मंदिर सेवायतों ने बताया आज कल के जो रंग बाजार में मिलते है वो मिलावटी होते है। किसी भी हुरियारे हुरियारिन व श्रद्धालुओं को त्वचा संबधित परेशानी हो सकती है। लेकिन टेसू के फूलों से बना ईको फ्रेंडली रंग से त्वचा को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचती। साथी ही इसकी खुशबू से मन में ताजगी बनी रहती है। साथी होली का वातावरण भी महकने लग जाता है।
श्रीजी मंदिर सेवायत सौरव गोस्वामी ने बताया लट्ठमार होली में बाजार के रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता है। हुरियारों के साथ श्रद्धालुओं पर डालने वाले रंग को टेसू के फूलों से बनाया जाता है।




